लाखों ग्रामीण औरतों की सहारा बनी एक चेतना
हमारे देश में बहुत सारे लोगों, खासकर राजनेताओं को इस बात का बड़ा गुमान रहता है कि उन्होंने न जाने कितने भारतीयों की जिंदगी संवार दी। दर-हकीकत, वे समूचे सिस्टम के काम का सेहरा अपने सिर सजाने की कोशिश करते रहते हैं और सरमायेदारों की एक पूरी फौज उनके दावों की मुनादी करती रहती है। ऐसे में, जब चेतना गाला सिन्हा जैसे जमीनी लोगों के काम सामने आते हैं, तब यह एहसास होता है कि हमारे सियासतदां इन लोगों के आगे कितने बौने हैं !

आज से करीब 68 साल पहले मुंबई के एक सुशिक्षित, आर्थिक रूप से सक्षम परिवार में. चेतना पैदा हुईं। महानगरीय सुविधाओं के बीच पली-बढ़ी चेतना को बचपन से ही बेहतर शिक्षण संस्थानों में पढ़ने का मौका मिला। 1980 के दशक की शुरुआत में जब वह बॉम्बे यूनिवर्सिटी की कॉमर्स स्नातक की छात्रा थीं, तभी उनकी मुलाकात प्रसिद्ध नेता जयप्रकाश नारायण से हुई। उस मुलाकात ने चेतना की पूरी चेतना बदल डाली। दरअसल, जेपी उन दिनों देश भर के कॉलेजों-यूनिवर्सिटियों में जा-जाकर नौजवानों का आह्वान कर रहे थे कि वे गांवों में जाकर काम करें।
चेतना चाहतीं, तो उन्हें मुंबई (तब बॉम्बे) में अच्छी नौकरी मिल सकती थी और वह एक आरामदेह जिंदगी भी जी सकती थीं, मंगर जेपी के दर्शन ने कुछ ऐसा जादू किया था कि वह महाराष्ट्र के गांवों में पहुंच वहां के भूमि अधिकार आंदोलनों, कृषि आंदोलनों व महिला सशक्तीकरण की मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगीं। इसी क्रम में चेतना सूखा प्रभावित गांव मसवाड़ पहुंचीं। वहां के युवा किसान नेता विजय सिन्हा से वह बहुत प्रभावित हुईं। विजय बहुत पढ़े-लिखे तो नहीं थे, मगर एक प्रखर वक्ता थे। उनकी बातें लोगों पर खूब असर करतीं। उन्हें सुनने बड़ी भीड़ जुटती। आहिस्ता-आहिस्ता चेतना और विजय एक-दूसरे से प्यार करने लगे और अंततः उन्होंने विवाह करने का फैसला किया।
घरवाले और कॉलेज के तमाम साथी चेतना के इस फैसले -से हैरान थे। उनका चौंकना स्वाभाविक भी था। कहां देश के सबसे महंगे, सुविधायुक्त महानगर में पली-बढ़ी लड़की और कहां एक सूखाग्रस्त गाँव जहां बुनियादी सुविधाएं तक न थीं। चेतना का परिवार चिंतित था कि वह निबाह कैसे करेंगी, उस गांव में तो शौचालय तक नहीं था ! नैतिक आदर्शों और प्रेम ने सभी चिंताओं व नसीहतों पर विजय पाई थी। चेतना ने विजय से विवाह भी किया और सन् 1987 में वह अपने ससुराल मसवाड़ आ बसीं।
मसवाड़ में रचे-बसे चेतना को कई वर्ष बीत चुके थे। वह तीन बेटों की मां बन चुकी थीं। एक दिन कांताबाई नाम की गांव की एक महिला चेतना से मिलने आईं और उनसे कहा कि वह बचत खाता खुलवाना चाहती हैं। चेतना ने कांताबाई से पूछा,क्या आपके पास इतने पैसे होते भी हैं कि आप बचा सको ? आप तो फुटपाथ पर रहती हो ? कांताबाई ने कहा, मैं पैसे बचाना चाहती हूं, ताकि मानसून के आने तक इतने रुपये जमा कर सकूं कि प्लास्टिक शीट खरीद पाऊं। वह अपने परिवार को बारिश की मार से बचाना चाहती थीं।
कांताबाई को लेकर चेतना बैंक पहुंचीं, मगर बैंक मैनेजर ने छोटी रकम का हवाला देते हुए खाता खोलने से साफ इनकार कर दिया। चेतना को यह बात बुरी तरह चुभी। कांताबाई कर्ज मांगने तो बैंक नहीं गई थीं, वह तो इतना भर चाहती थीं कि मेहनत से कमाई गई उनकी छोटी रकम भी सुरक्षित रहे। चेतना ने सोचा कि यदि बैंक यह काम नहीं कर रहा, तो क्यों न एक कॉपरेटिव बैंक शुरू किया जाए, ताकि कांताबाई जैसी औरतों को बचत का मौका मिले।
साल 1996 में उन्होंने लाइसेंस के लिए आवेदन किया। रिजर्व बैंक ने यह कहते हुए चेतना का आवेदन खारिज कर दिया कि आरबीआई ऐसे बैंक की इजाजत नहीं दे सकता, जिसके प्रमोटर्स अशिक्षित हों।
चेतना लगभग रोती हुई गांव लौटीं और कांताबाई व दूसरी औरतों को बताया कि वह लाइसेंस नहीं हासिल कर सकीं, क्योंकि आप लोग पढ़ी-लिखी नहीं हो। औरतों ने कहा, आप मत रोइए, हम लिखना-पढ़ना सीखेंगे और फिर से लाइसेंस के लिए आवेदन देंगे। छह महीने में चेतना की मेहनत ने रंग दिखाया, मसवाड़ की महिलाओं ने लिखना-पढ़ना, दस्तखत करना सीख लिया।
सन् 1997 में चेतना 15 महिलाओं को साथ लेकर आरबीआई की दहलीज पर पहुंचीं। आरबीआई ने चेतना व उनके गांव की महिलाओं के जज्बे को सलाम करते हुए लाइसेंस जारी कर दिया और इस तरह देश का पहला महिला ग्रामीण बैंक (मान देशी महिला बैंक) वजूद में आया।
यह महिलाओं का अपना बैंक था। उनके हितों की खैरख्वाह चेतना ने एक और कमाल किया। चूंकि गरीब महिलाएं बैंक नहीं आ सकती थीं, क्योंकि इससे उनकी मजदूरी या काम का नुकसान होता, इसलिए बैंक उनके घर तक पहुंचा। महिलाओं का महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा संचालित इस बैंक ने कांताबाई को पक्का मकान बनाने में ही मदद नहीं की, बल्कि इसने महाराष्ट्र की लाखों महिलाओं की जिंदगी को रोशन किया। यह बैंक बेटियों को साइकिल, महिलाओं को सिलाई मशीन से लेकर दूसरे उपकरण खरीदने या कोई कारोबार शुरू करने के लिए कर्ज देता है। बीते वर्षों में मान देशी महिला बैंक का कारवां बढ़ता गया। आज दस लाख सेअधिक महिलाएं इसकी खाता धारक हैं और इस बैंक की बाजार-कीमत 200 करोड़ रुपये की है। चेतना की इस खामोश क्रांति को पूरी दुनिया ने सराहा। उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। साल 2018 में वह वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सह-अध्यक्षता करने वाली हिन्दुस्तान की पहली महिला बनीं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह
