कम्यूनिष्टों की करतूतें

आजादी के पहले कम्युनिष्ट पार्टी के बड़े-बड़े नेता ब्रिटिश सरकार सरकार के गुप्तचर विभाग से धन प्राप्त करते थे और देशभक्त स्वाधीनता सेनानियों की मुखबरी करके उनकी गतिविधियों की जानकारी ब्रिटिश सूचना तंत्र को देते थे। पार्टी के वरिष्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे ने तो अपनी सेवायें अंग्रेजी सरकार को पूरी तरह समर्पित कर दी थीं और वह अंग्रेजों के लिए जासूसी करते थे। 1964 में पार्टी विभाजन के समय नम्बूदरीपाद ने खुद डांगे पर यह आरोप लगाया था।
क्या आजादी की लड़ाई में भारतीय कम्युनिस्टों का कोई योगदान रहा था? इसका लेखा-जोखा किया जाए तो स्पष्ट होगा कि आजादी की लड़ाई के सबसे महत्वपूर्ण मुकाम 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी कम्युनिस्टों ने न केवल स्वाधीनता सेनानी देशभक्तों के साथ विश्वासघात किया बल्कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद के ‘दलाल’ के रूप में भूमिका भी निभाई।
देश से गद्दारी :-
स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी ने 1942 में अंग्रेज. सरकार को एक रिपोर्ट दी थी कि हमने भारत छोड़ो आन्दोलन को नाकाम करने के लिए बहुत अच्छा काम किया। 11 अक्टूबर 1942 को कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘पीपुल्सवार’ में लिखा गया कि सत्याग्रहियों और भूमिगत आन्दोलनकारियों में फूट पड़नी जरूरी है। तभी इसका लाभ लेना सम्भव है।
कम्युनिस्टों ने ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों व सैनिक मुख्यालय के मार्गदर्शन में 300 से ज्यादा छापामारों का एक विशेष आत्मघाती दस्ता तैयार किया और उसे अंग्रेज व अमेरिकी अधिकारियों से पूना के पहाड़ी इलाकों में प्रशिक्षण दिलवाया। यह दस्ता भारत छोड़ो आन्दोलन और आज़ाद हिन्द फौज को विरूद्ध अत्यन्त खतरनाक कामों को अंजाम देने के लिए तैयार किया गया था।
कम्युनिस्ट पार्टी ने 23 अप्रैल, 1942 को एक नीति प्रारूप के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से प्रार्थना की कि कम्युनिस्टों को ब्रिटिश सेना की सहायता करने का अवसर प्रदान किया जाए। पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी.सी. जोशी की महत्वपूर्ण ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों तथा गृह सचिव रेगिनाल्ड मैक्सवैल से खास मुलाकातें करायी गयीं और पार्टी की अंग्रेजी राज समर्थक भूमिका के चलते 23 जुलाई, 1942 को पार्टी से प्रतिबन्ध उठा लिया गया तथा जेलों में बन्द उसके कार्यकर्ता रिहा कर दिए गए। तत्कालीन वायसराय ने गंगाधर अधिकारी और पी.सी. जोशी जैसे प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं का कांग्रेस विरोधी दुष्प्रचार में इस्तेमाल किया।
प्रमुख कम्युनिस्ट नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद ने ‘भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास’ में यह स्वीकार किया है कि ‘हमने भारत छोड़ो आन्दोलन का मुकाबला करने और सुभाष चन्द्र बोस का विरोध करने की पूरी तैयारी कर ली थी।’ कम्युनिस्टों में यह अंग्रेजी राजप्रेम भी यों ही नहीं उमड़ पड़ा था। दरअसल रूस के निर्देश पर ही भारतीय कम्युनिस्टों ने अपना रूख बदला।
अंग्रेजी की मुखबरी :-
आज़ादी के पहले कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े-बड़े नेता ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग से धन प्राप्त करते थे और देशभक्त स्वाधीनता सेनानियों की मुखबरी करके उनकी गतिविधियों की जानकारी ब्रिटिश सूचना तंत्र को देते थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता श्रीपाद अमृत डांगे ने तो अपनी सेवायें अंग्रेजी सरकार को पूरी तरह समर्पित कर दी थी और वे अंग्रेजों के लिए जासूसी करते थे।
1964 में पार्टी विभाजन के समय नम्बूदरीपाद ने खुद डांगे पर यह आरोप लगाया था। सरकारी दस्तावेजों में भी इसकी पुष्टि करने वाले तमाम प्रमाण मौजूद हैं। प्रख्यात पत्रकार अरूण शौरी की पुस्तक ‘द ओनली फादरलैण्ड’ तो ऐसे प्रमाणों से भरी पड़ी हैं।
कम्युनिस्टों ने देशभक्त जनता का मनोबल तोड़ने के लिए स्वाधीनता आंदोलन के प्रेरक महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस जैसे राष्ट्रनायकों को जी भर के गालियां दीं। गांधी जी को तो उन्होंने साम्राज्यवादी कुत्ता तक कहा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को तोजो (जापानी जनरल) का कुत्ता, विदेशियों का एजेन्ट और देशद्रोही कहकर अपमानित किया। नेताजी ने जब कम्युनिस्टों से अपील की कि वे स्वाधीनता आन्दोलन की पीठ में छूरा न भोंक कर भारत छोड़ो आन्दोलन का समर्थन करें तो कम्युनिस्टों ने मुम्बई कांग्रेस में न केवल उस अपील को ठुकरा दिया बल्कि 10 जनवरी 1943 को कम्युनिस्ट मुख पत्र ‘पीपुल्स वार’ में प्रमुख कम्युनिस्ट नेता बी.टी. रणदिवे ने सुभाष बोस को फासिस्टों का एजेन्ट कहा।
भारत विभाजन का समर्थन :-
पाकिस्तान निर्माण को सैद्धान्तिक भाव-भूमि देने वाले कम्युनिस्ट ही थे क्योंकि उन्होंने भारत को कभी एक राष्ट्र माना ही नहीं। उन्होंने भारत में बहुराष्ट्रवाद की संकल्पना प्रस्तुत की। इसी आधार पर कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान निर्माण की मांग का पुरजोर समर्थन किया। यहां तक कि पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को मुस्लिम लीग में शामिल हो जाने का निर्देश भी जारी कर दिया और पी.सी. जोशी ने गांधी जी को दोषी ठहराते हुए जिन्ना का पूरा समर्थन कर दिया।
कम्युनिस्ट पार्टी ने उसक समय ‘पाकिस्तान और राष्ट्रीय एकता’ नामक पुस्तिका प्रकाशित कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का यह नुस्खा सामने रखा कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता हो, तभी राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी और इस समझौते की शर्त को पाकिस्तान निर्माण की जिन्ना की मांग को स्वीकार किया जाना। कम्युनिस्टों की इस भूमिका पर अंग्रेजों ने प्रसन्नता व्यक्त की कि ‘ एक गैर मुस्लिम पार्टी’ मुस्लिम लीग की समर्थन कर रही है।
1946 में मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही की घोषणा की तो कलकत्ता में हुई एक जनसभा में ज्योति बसु मौजूद थे, उस सभा में कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग का समर्थन करते हुए भाषण दिय थे। यह सब क्या देश की आज़ादी में उनका योगदान माना जाए?
कम्युनिस्टों के चरित्र को सुभाष बोस ने सही आंका था और उस आकलन को आज फिर सामने लाने की जरूरत है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘भारत का संघर्ष’ (इंडियन स्ट्रगल) में कम्युनिस्टकों की तुलना फासिस्टों से करते हुए लिखा कि ‘भारत कम्युनिज्म को नहीं अपनाएगा क्योंकि कम्युनिज्म राष्ट्रवाद को स्वीकार नहीं करता जबकि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन है।
कम्युनिज्म धर्म को अस्वीकार करता है जबकि भारतीय जागरण का उद्भव ही धार्मिक सुधार के आंदोलन व सांस्कृतिक चेतना में से हुआ।
