कामनाओं की नहीं, संकल्पों की पूर्ति

मनोकामनाएँ कदाचित ही किसी की पूरी होती हैं, पर संकल्प सभी के पूरे होकर रहते हैं। मनोरथ उन सनकों को कहते हैं, जो कि वैभव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा के रूप में व्यक्तियों के मन में उठती रहती हैं। कभी उनका अंत नहीं होता। एक के बाद एक उससे बड़ी दूसरी उठती रहती है, अतएव संतोष मिलने का कोई समय ही नहीं आता। कामनाओं की सीमा नहीं। असीम की परितृप्ति कैसे हो और अपने असंतोष की पूर्ति कैसे हो ? किसी कारण से अथवा संयोगवश कोई मनोरथ पूरा हो भी जाए, तो भी उस अपवाद से यह सिद्ध नहीं होता कि भविष्य में भी इसी प्रकार अंधे के हाथ में बटेर पड़ती रहेगी।

ईश्वर ने मनुष्य को सार्थक मस्तिष्क देकर बुद्धिमान बनाया है। साथ ही इतनी सूझबूझ भी दी है कि उसका स्तर बनाए रखकर भी काम चलाऊ उपार्जन सरलतापूर्वक संपन्न किया जाता रहे। कामनाओं को औचित्य की सीमा में मर्यादित रखा जाए, तो उनकी प्राप्ति एवं प्रगति का द्वार भी खुलकर ही रहता है।

कल्पना दिशा निर्धारण करती है और उसके आधार पर जो स्वरूप बनाया गया है, उसका प्रारूप निखरता है। इसके बाद पुरुषार्थ की बारी आती है और यदि सुनियोजित ढंग से पुरुषार्थ किया गया हो, तो परिणाम श्रेयस्कर होता है। प्रगति उस स्तर तक बढ़ती चली आती है, जहाँ पहुँचकर कामनाओं की पूर्ति का अनुभव और आनंद प्राप्त किया जा सके।

संकल्प कामना से ऊँचे स्तर पर है। उसमें कुछ कर गुजरने का निर्धारण होता है। जुट पड़ने का निश्चय और करके रहने का व्रत। संकल्प सदा सबके पूरे होते रहे हैं, क्योंकि उनमें मनोरथ का उपयुक्त मूल्य चुकाने का निश्चय जुड़ा होता है। इतना ही नहीं इतना धैर्य भी होता है कि मंजिल तक पहुँचने में यदि कुछ विलंब या व्यवधान आए, तो उसकी पूर्ति के लिए

प्रतीक्षा की जाए और अपनी तत्परता-तन्मयता को और अधिक प्रखर किया जाए।

संकल्प में निश्चित लक्ष्य पर पहुँचने के लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने की लगन होती है, उसमें प्रतिफल के लिए उतावली नहीं होती, उसका निश्चय होता है। उतावली में आदमी समय अधिक लगने पर अधीर हो उठता है। व्यवधान अड़ जाने पर भी उसे अपनाए रहने और कठिनाइयों से जूझते रहने का भी साहस नहीं होता। कार्यपद्धति में कोई हेरफेर अभीष्ट हो तो उसे करने के लिए भी सूझ-बूझ साथ देती है। संकल्प में इच्छाशक्ति और भावनाशक्ति दोनों ही जुड़ी होती हैं। उसकी रूपरेखा विचारपूर्वक बनाई जाती है और उसे उपलब्ध करने के लिए जिन साधनों और सहयोग की अपेक्षा है, उनकी भी समय रहते व्यवस्था जुटा ली गई होती है। उसके पीछे सुनियोजित भावना रहती है, किंतु मनोकामना तो एक प्रकार का भावावेश है। उसके पीछे न दूरदर्शी विवेकशीलता का समावेश होता है और न समुचित तैयारी वाली परिकल्पना एवं साधन संपन्नता। प्रतिरोधों की चिंता भी समय रहते कर ली जाती है।

संसार का कोई कार्य इतना सरल नहीं है कि वह चुटकी बजाते ही तुरतफुरत पूरा हो जाया करे। सभी प्रयासों के लिए प्रतिस्पर्धा में उतरना पड़ता है और अपनी क्षमता का इतना विकास करना पड़ता है कि कठिनाइयाँ विचलित न कर सकें। देर लगने पर मन उतावली न करने लगे। जो बबूले की तरह उठते हैं, वे झाग की तरह बैठ भी जाते हैं। कामनाएँ उबलते दूध के समतुल्य खाली बरतन को भी भरा दिखा देती है और कुछ ही समय में बैठ भी जाती हैं, किंतु संकल्प शब्दभेदी बाण की तरह है, जो निशाना वेधकर ही रहता है। हम कामनाओं की नहीं, संकल्पों की पूर्ति में अपना पुरुषार्थ जुटाएँ, यही मानवोचित है।

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