जहाँ चाह, वहाँ राह
पिता नौकरी करते थे। उन्हें तीन रुपये मासिक वेतन मिलता था। घर में पत्नी बच्चों के अलावा माता-पिता भी थे। इतने बड़े परिवार का खर्च तीन रुपये मासिक में मुश्किल में चलता था। ऐसी स्थिति में पुत्र को पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने के साधन कहाँ से जुटते..? मन में बड़ी कसक उठती थी कि किसी भी प्रकार बच्चों को पढ़ा-लिखाकर सुयोग्य बनाया जाए, परंतु प्रश्न वही साधनों का था। बालक ईश्वरचंद्र भी गाँव के अन्य बच्चों को पढ़ने के लिए दूसरे गाँव के स्कूल में जाते देखकर मचल उठता, ‘पिताजी ! मुझे भी स्कूल में भरती करवा दो न ! मैं भी पढ़ूँगा।’ पिता की छाती भर आती थी, पुत्र की उमंग और अपनी विवशता देखकर। वह समझाते, ‘बेटा ! तुम्हारे भाग्य में ही विद्या नहीं है। अगर विद्या होती, तो तुम मुझ जैसे निर्धन बाप के घर में क्यों जन्म लेते।‘
पिता की विवशता देखकर ईश्वरचंद्र मन मसोस कर रह जाता। इससे अधिक वह कर ही क्या सकता था ? पर पढ़ने की चाह कम नहीं हुई। जहाँ चाह वहाँ राह वाली उक्ति के अनुसार ईश्वरचंद्र ने राह निकाल ही ली। उसने गाँव के स्कूल जाने वाले बच्चों से दोस्ती गाँठकर उनकी पुस्तकों के सहारे अक्षर-ज्ञान कर लिया और एक दिन कोयले से जमीन पर लिखकर अपने पिता को दिखाया। ईश्वरचंद्र की विद्या के प्रति यह लगन देखकर पिता का हृदय अधीर हो उठा और वे अपनी गरीबी को कोसने लगे। एक दिन ईश्वरचंद्र अपने पिता के साथ किसी काम से कलकत्ता की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक जगह सुस्ताने के बाद पिता ने कहा, ‘न जाने कितनी दूर चले आए हैं?’ ईश्वरचंद्र ने कहा कि नौ मील आ गए हैं। “तुमने कैसे जाना ?” पिता ने पूछा। “रास्ते में हमने सबसे बाद में जो मील का पत्थर देखा था, उसे देखकर। उस पर नौ का अंक लिखा था।” पिता यह जानकर हर्षविभोर हो उठे कि उनके पुत्र ने अंगरेजी के अंकों का भी ज्ञान प्राप्तकर लिया है। मन में बड़ी उथल-पुथल हुई और काम से निबटकर घर लौटे, तो अपनी पत्नी से रास्ते की सारी घटना कह सुनाई। पत्नी ने कहा, “लड़का है तो बुद्धिशाली पर दुर्भाग्य कि हमारे घर में पैदा हुआ है।” इस दुर्भाग्य का कलंक अब और न रहने दूँगा। पिता ने कहा- ‘भले ही हम लोग एक समय भोजन करें, पर ईश्वरचंद्र को स्कूल अवश्य भेजेंगे।’ पत्नी की सहमति से ईश्वरचंद्र को गाँव की पाठशाला में भरती करा दिया, उन्होंने सभी परीक्षाएँ मेहनत से प्रथम श्रेणी में पास कीं। गाँव की पढ़ाई पूरी हो गई, तो आगे शहर में पढ़ने का सवाल था। आर्थिक विवशता आड़े आती थी। ईश्वरचंद्र ने स्वयं अपनी राह बनाई और आगे पढ़ने के लिए माता-पिता से केवल आशीर्वादभर माँगा। उसने कहा- ‘आप मुझे किसी विद्यालय में भरतीभर करा दें। फिर मैं आपसे किसी प्रकार का खर्च नहीं मागूँगा।’ तदनुसार पिता ने ईश्वरचंद्र को कलकत्ता के एक संस्कृत विद्यालय में भरती करवा दिया। विद्यालय में ईश्वर की सेवा, लगन और परिश्रम, प्रतिभा से शिक्षक इतने प्रसन्न व प्रभावित हुए कि उनकी फीस माफ हो गई। पुस्तकों के लिए वह मित्रों के साझीदार हो गए और पढ़ाई से बचे समय में मजदूरी कर गुजारे का प्रबंध करने लगे। इस अभावग्रस्तता में ईश्वरचंद्र ने इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष की आयु में पहुँचते-पहुँचते उन्होंने व्याकरण, साहित्य स्मृति तथा वेदशास्त्रों में निपुणता प्राप्त कर ली। ये ही आगे चलकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम से शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में अपनी महत्त्वपूर्ण सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हुए।
